श्रीलाल शुक्ल के पहला पड़ाव का समाजभाषा-वैज्ञानिक अध्ययन
वैभव कुमार पाण्डेय, डॉ. आभा तिवारी
साहित्य एवं अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शु. वि वि. रायपुर
मानव से समाज है और समाज से भाषा या यह भी कह सकते हैं कि मनुष्य की भाषा परिवार से समाज तक कायम है। इस समाजभाषा को हम श्रीलाल शुक्ल के पहला पड़ाव उपन्यास से बेहतर तरीके समझ सकते हैं। पहला पड़ाव को एक सामाजिक उपन्यास कहना बेहतर होगा, क्योंकि श्री शुक्ल ने इस उपन्यास में रोजी-रोटी के लिए पलायन पर जाने वाले दिहाड़ी मजदूरों के जीवन का एक जीवंत चित्रण किया है। शुक्ल ने इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, दुर्ग संभाग से आने वाले मजदूरों को केन्द्र बिंदु में रहकर उनके सामाजिक जीवन को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है। समाज के मजदूर, जाति-वर्ग, मालिक वर्ग और बंधुआ जीवन जीने वाले लोगों की संघर्षगाथा पहला पड़ाव में जीवन का ठहराव भी है, दर्द भी और घाव भी है। उपन्यास का सामाजिक पक्ष बेहद मजबूत है और इसमें हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, सहित क्षेत्रीय भाषा भोजपूरी और छत्तीसगढ़ी के भाषायी तत्व विद्यमान है।
भूमिकाः
श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों में एक उपन्यास है पहला पड़ाव। मुझे लगता है ये उपन्यास छत्तीसगढ़ वालों को जरूर पढ़नी चाहिए. क्योंकि इस उपन्यास के जरिए हम एक ऐसे तबके को भली भाँति समझ पाएँगे, एक ऐसे वर्ग को गहराई से जान पाएँगे जो पलायन करते हैं. जी हाँ छत्तीसगढ़ से पलायन करने वाले मजदुरों की दुनिया को जिस पड़ाव के जरिए शुक्ल ने समझाया उसका नाम है पहला पड़ाव।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पहला पड़ाव को अगर समाज में मजदूरों की दुनिया, जाति-वर्ग, सामाजिक-आर्थिक संरचना का पड़ाव है. यह पड़ाव समस्या से उठते सवालों के समाधान को तलाशता है।
श्रीलाल शुक्ल और पहला पड़ावः
श्रीलाल शुक्ल के साहित्यों के अध्ययन से पता चलता है कि उन्होंने किस गंभीरता के साथ समाज और समाज के बीच रहने वाले लोगों का अध्ययन कर उसे उपन्यास और कहानी के रूप में गढ़ा है। पहला पड़ाव उपन्यास श्री शुक्ल के राग दरबारी उपन्यास की तरह एक व्यंग्य मारक शैली का उपन्यास कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें समाजिक जीवन यापन के वही सभी रंग मिलते हैं जिसमें जाति भेद, वर्ग भेद, ग्रामीण और शहरी जीवन का अंतर दिखाई देता है। श्रीलाल शुक्ल जिस तरह से अपने छात्र जीवन में एक संघर्षशील और आंदोलनकारी व्यक्ति की भूमिका में दिखाई पड़ते हैं, जहाँ व्यवस्था के खिलाफ उनका आक्रोश दिखता है, उसी तरह से उनके उपन्यास पहला पड़ाव में व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश के साथ कई बुनियादी सवाल समाज और सत्ता के बीच उभर आते हैं। पहला पड़ाव श्री शुक्ल के उपन्यासों में सबसे अलग गंभीर चिंतनशील उपन्यास की श्रेणी में रखा जाने वाला उपन्यास है। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि ग्रामीण जीवन का होकर भी शहरी वातावरण के जीवन यापन की है। पहला पड़ाव में शुक्ल ने समाज के उस वर्ग को केन्द्रित किया है जिसकी पहचान पलायनवादी, बंधुआ और दिहाड़ी मजदूरों के रूप में शहरों में होती है। इस उपन्यास के जरिए शुक्ल ने एक ऐसे पड़ाव को रेखांकित किया जो तब से लेकर 21वीं सदी के इस आधुनिक युग में वैसे ही सजीव जान पड़ते हैं जैसे अतीत में जान पड़ते थे।
पहला पड़ाव और छत्तीसगढ़ः
इस उपन्यास का सीधा संबंध छत्तीसगढ़ से है। अगर कोई छत्तीसगढ़ के मजदूरों और विशेषकर पलायन करने वालें या बंधुआ मजदूरों पर अध्ययन या शोध कर रहा हो तो उसे श्री शुक्ल का यह उपन्यास जरूर पड़ना चाहिए। शुक्ल ने इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, दुर्ग संभाग से आने वाले मजदूरों को केन्द्र बिंदु में रहकर उनके सामाजिक जीवन को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है। इस उपन्यास में पता चलता है कि किस तरह से रोजी-रोटी की तलाश में उत्तरप्रदेश के शहरों में ईंट भट्टा से लेकर बड़ी इमारतों के निर्माण करने के लिए छत्तीसगढ़ से मजदूर पहुँचते हैं। शुक्ल के इस उपन्यास में बिलासपुर के मजदूरों को जी-तोड़ मेहनत करने वाले और राज मिस्त्री के कार्य में दक्ष भी बताया है। साथ ही किस तरह से ठेकेदार दलालों के साथ शहरी लोगों की बुरी नियत भी मजदूरों के परिवारों पर रहती है इसका सजीव चित्रण शुक्ल ने इस उपन्यास में किया है। श्री शुक्ल लिखते हैं कि, पहला पड़ाव की कथा में आया अनुभव निम्नवर्गीय और मध्यवर्गीय जीवन के बीच परस्पर आवा-जाही की संवेदना से अर्थ की एक नई चमक पा सका है। 16-16, 18-18 साल की लड़कियाँ या बच्चे को पेट या गोद में लेकर घुमती हुई औरतें, जो वहाँ मकान बना रही हैं ज्यादातर छत्तीसगढ़ से आई हैं। मजदूरों के दलाल उन्हें एडवांस देकर यहाँ ले आते हैं। ये यहाँ आकर पाते भी क्या हैं ? इनकी उपलब्धि सिर्फ इतनी होती आधी -तिहाई मजदूरी, सुअर-बाड़े जैसी झोपड़ियाँ, बेइज्जती, बीमारी। कानून में बंधुआ न होते हुए भी ये सबसे बड़ी जकड़ में फंसे हुए बंधुआ मजदूर हैं।”
हिन्दी और स्थानीय शब्दः
पहला पड़ाव उपन्यास ग्रामीण भारत की शहरी तस्वीर को समाज के सामने, समाज के ही सहारे रखता है। यह उपन्यास पूरी तरह से ग्रामीण समाज के इर्द-गिर्द घुमती है। यही वजह कि उपन्यास में स्थानीय शब्दों का प्रचुर मात्रा में समावेश मिलता है। उपन्यास का क्षेत्र उत्तप्रदेश है, लेकिन उपन्यास के प्रमुख पात्र गण छत्तीसगढ़ के होने के कारण इसमें छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग मिलता है।
जैसे- तमचा (देशीकट्टा), मेचका (मेढक), टटपुंजिया (छोटे-मोटे), किरिया-करम (अंतिम संस्कार), किरा (साँप), जोत-जँवारा (नवरात्र पर्व)
अंग्रेजी शब्दः
इसी तरह से उपन्यास में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग उपन्यास के पात्र अपनी सुविधा के मुताबिक करते हैं। लेकिन मजे की बात ये है कि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग जब कोई मजदूर तबके का या ग्रामीण व्यक्ति करता है उसके उच्चारण में परिवर्तन साफ तौर पर दिखाई देता है।
जैसे- कॉलिज (कॉलेज), सिकेटरी (सेक्रटरी), यल.यल. बी (एलएलबी)
पहला पड़ाव का समाजभाषा-वैज्ञानिक पक्षः
भाषा पूरी तरह से समाजिक व्यवस्था है। भाषा को इस रूप में भी समझ सकते है कि समाज, जाति या देश की सभी विशेषताएँ इसमें निहित होती है। समाजभाषा-विज्ञान का यही मूल अर्थ रहा है कि कौन, किस समय, किस स्थान पर किस विषय में किससे, कैसी भाषा में बात करता या प्रयोग करता है। पहला पड़ाव के अध्ययन के दौरान पता चलता है कि, यहाँ भाषाई तौर पर समाज के विभिन्न अंग और रंग दिखाई पड़ते हैं। उपन्यास में पात्रों के बीच संवाद में ग्रामीण और शहरी भाषा के साथ हिन्दी-अंग्रेजी के मिश्रित भाषा का प्रयोग भी मिलता है। यही वहज है एक भाषिक समुदाय में एक से अधिक कोड मिलता है। उपन्यास में यूपी क्षेत्र के स्थानीय लोक भाषा, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का कोड मिलता है। पहला पड़ाव में कोड मिश्रित और कोड परिवर्तित भाषिक रूपों का प्रयोग अधिक मात्रा में देखने को मिलता है।पहला पड़ाव के उपन्यास के इस छोटे से अंश से उसके समाजिक-भाषिक पक्ष को समझा जा सकता है। श्री शुक्ल ने रेलगाड़ी की यात्रा के जीवंत दृश्यों को रेखांकित करते हुए लिखा है कि, “कुछ समाजशास्त्री पंडितों ने भारतीय रेलगाड़ी को पहियों पर चिलता-फिरता भारतीय गाँव बताया है। पर दरअसल रेलगाड़ी के मुकाबिले गाँव बड़ी अदना चीज है। रेलगाड़ी गाँव, कस्बा, शहर सहित कई सभ्यता और संस्कृति का संगम है। इन सबके साथ अपनी ख़ास गुण्डागर्दी का भी, वैसे भी गुण्डागर्दी का अलग से नाम लेने की जरूरत नहीं, वह भी सभ्यता में शामिल है, या संस्कृति में या शायद दोनों में या शायद दोनों मिलकर गुण्डागर्दी में। बहरहाल, जब आपके डिब्बे पर ककड़ी-खीरा, जामुन, आम, तला चना, अमरूद, मूँगफल्ली और गन्ना बेचनेवाले कड़कदार आवाज के साथ धावा बोलते हैं तो वह गाँव हो जाता है। जवान बिटिया को बछिया की तरह आगे करके सोहर गाती हुई बेवा जब कटोरा खनकाकर उसकी शादी के लिए भीख माँगती है तो वही डिब्बा टाउन एरिया बन जाता है। जब पॉकेटमार और ज़हर खिलानेवाले डिब्बे में घुसते हैं और उनके साथी घुटनों पर अटैची की मेज़ बनाकर ताश खेलते हैं और ठर्रा पीते हैं, तो वहाँ एकदम चैबीस कैरेटवाला शहर उतर आता है। अंधे, लूले, लँगड़े या कोढ़ी और मिठाई-पान-बीड़ी-सिगरेट बेचनेवाले डिब्बे में किसी शहरी हनुमान जी के मंदिर का माहौल पैदा करते हैं।”
इसी तरह से उपन्यास में लेखक ने मजदूर जाति-वर्ग और जमींदार मालिक वर्ग के बीच के संवाद में जाति और वर्ग के बीच समाजभाषा को कुछ इस रूप में रेखांकित किया है;
हम लोग पुराने जमींदार रहे हैं। अपने हलवाहे को भी काका कहते थे। अके न चाय पीएँगे और न पान खाएँगे। “चाय तो पी ही नहीं मालिक,” नेता बोले।
परतात्मा जी ने दो का दूसरा नोट निकाला, कहा लो पी लेना।”
“इससे क्या होगा मालिक ? तेरह सौ रुपया कल रेल में धरा लिया लुटेरों ने।” अब मालिक के हाथ लगाए बिना...।
“कब ? कहाँ? कैसे ? क्या हुआ ? के जवाब में मैंने पूरी घटना सुनाई। मेरे लिए यह आँखों-देखा-हाल जैसा था।
परमात्मा जी ने कहा, “तब तो नेता को कुछ एडवांस देन ही होगा।”
मिस्त्री बोले, “पाँच सौ काफी होंगे सरकार।”
मैंने कहा, “इतने इतना बहुत है। दो-तीन सौ ठीक रहेगा।”
परमात्मा जी बोले, “तुम हो पोंगा। इन्हें पचास रुपये दे दो। पाँच सौ पाना है तो मजूरी करके कमाएँ, जुआ खेलना बंद करें।”
निष्कर्षः
दरअसल समाजभाषा-विज्ञान की संकल्पना के मूल में यही प्रेरक प्रश्न निहित रहा है अर्थात कोन, किस समय, किस स्थान पर, किस विषय में किससे, कैसी भाषा का प्रयोग करता है। किसी भी भाषिक समुदाय प्रयोजनों एवं वक्त़ा-श्रोता में सम्बंधों के अनुरूप वाक्-उचारण में परिवर्तन होते रहता है। यही कारण है कि पहला पड़ाव में एक से अधिक कोड मिलते हैं। इसमें हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, उर्दू, अंग्रेजी भाषा के मिश्रित और परवर्तित कोड मिलते हैं। इस उपन्यास में श्री शुक्ल ने ग्रामीण भारत की तस्वीर को शहर के भीतर जिस तरीके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक संरचनाओं में पिरोकर जीवंत किया है वह अद्भूत है। शुक्ल ने जिस तरह से छत्तीसगढ़ से पलायन करने वाले मजदूरों की अंतरकथा को कही उससे वह शायद वही समझ सकता जिसने पलायन को भोगा हो या मजदूरों के बीच जिंदगी जिया हो. उपन्यास के समाजभाषा-वैज्ञानिक अध्ययन जो तथ्य समाने आतें है वास्तव में इस उपन्यास के जरिए हम पलायन की वास्तविकता, मजदूरों की स्थिति को बेहतर तरीके समझ सकते हैं. और शायद इस उपन्यास के जरिए हम पलायन की समस्या के समाधान को भी ढूँढ सकते हैं.
संदर्भ सूचीः
1 श्रीलाल शुक्ल: पहला पड़ाव; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1987 पृष्ठ संख्या- 09, 13, 58
2 डॉ. भोलानाथ तिवारी एवं मुकुल प्रियदर्शनी: हिन्दी भाषा की सामाजिक भूमिका; दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास प्रकाशक, लेख: मुकुल प्रियदर्शनी, भाषा और समाज का सहसम्बंध, प्रमथ संस्करण, पृष्ठ 31
3 डॉ. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव: हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र; पृष्ठ, 69
4 वान्द्रियेज ‘अनुः जगवंश किशोर बलवीर’: भाषा इतिहास की भाषा वैज्ञानिक भूमिका, हिंदी समिति, लखनऊ, 1966, पृ. 12
Received on 22.09.2017 Modified on 11.10.2017
Accepted on 16.11.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(4):193-196 .